करेंट अफेयर्स 15.01.2022

 करेंट अफेयर्स 15.01.2022

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1. 5G में मिलीमीटर वेव बैंड

सैटकॉम इंडस्ट्री एसोसिएशन-इंडिया (SIA) ने 5जी स्पेक्ट्रम नीलामी में मिलीमीटर वेव (mm Wave) बैंड को शामिल करने की सरकार की योजना पर चिंता व्यक्त की है।

SIA एक औद्योगिक निकाय है जो भारत में संचार उपग्रह पारिस्थितिकी तंत्र के हितों का प्रतिनिधित्त्व करता है।

भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण (ट्राई) ने नीलामी के लिये स्पेक्ट्रम की मात्रा से संबंधित विषयों पर उद्योगों के विचार मांगे थे।

5G 5वीं पीढ़ी का मोबाइल नेटवर्क है। यह 1G, 2G, 3G और 4G नेटवर्क के बाद एक नया वैश्विक वायरलेस मानक है। 5G नेटवर्क एमएम वेव स्पेक्ट्रम में काम करेगा।

- यह एक नए प्रकार के नेटवर्क को सक्षम बनाता है जिसे मशीनों, वस्तुओं और उपकरणों सहित लगभग सभी को एक साथ जोड़ने के लिये डिज़ाइन किया गया है।

5G में बैंड: 5G मुख्य रूप से 3 बैंड में काम करता है, अर्थात् निम्न, मध्य और उच्च आवृत्ति स्पेक्ट्रम जिनमें से सभी के अपने उपयोग के साथ-साथ सीमाएँ भी हैं।

निम्न बैंड स्पेक्ट्रम: यह इंटरनेट और डेटा एक्सचेंज की कवरेज एवं गति के मामले में बहुत अच्छा कार्य  करता है, हालाँकि अधिकतम गति 100 एमबीपीएस (प्रति सेकंड मेगाबिट्स) तक सीमित है।

मध्य बैंड स्पेक्ट्रम: यह कम बैंड की तुलना में उच्च गति प्रदान करता है, लेकिन कवरेज क्षेत्र और सिग्नल के प्रवेश के मामले में इसकी सीमाएँ हैं।

उच्च बैंड स्पेक्ट्रम: इसमें तीनों बैंडों की उच्चतम गति है, लेकिन इसमें बेहद सीमित कवरेज और सिग्नल इनपुट क्षमता है।

- 5G के हाई-बैंड स्पेक्ट्रम में इंटरनेट की गति का परीक्षण 20 Gbps (गीगाबिट प्रति सेकंड) के रूप में किया गया है, जबकि अधिकांश मामलों में 4G में अधिकतम इंटरनेट डेटा गति 1 Gbps दर्ज की गई है।

2. वैवाहिक बलात्कार का अपराधीकरण

दिल्ली उच्च न्यायालय में वैवाहिक बलात्कार के अपराधीकरण की मांग वाली याचिका दर्ज की गई है।

इसके जवाब में केंद्र सरकार ने कहा कि वह इसे अपराधी बनाने की दिशा में "रचनात्मक दृष्टिकोण" पर विचार कर रही है और विभिन्न हितधारकों से सुझाव भी मांगे है।

- याचिका में आपराधिक कानून में संशोधन की मांग की गई है, जिसमें भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 375 (बलात्कार) शामिल है।

  • - बलात्कार के अभियोजन के लिये "वैवाहिक प्रतिरक्षा" का आधार समाज की पितृसत्तात्मक सोच से उभरा हैं।

  • जिसके अनुसार, विवाह के बाद एक पत्नी की व्यक्तिगत एवं यौन स्वायत्तता, शारीरिक अखंडता और मानवीय गरिमा का अधिकार आत्मसमर्पित हो जाता है।

  • सत्तर के दशक में नारीवाद की दूसरी लहर के प्रभाव से ऑस्ट्रेलिया वर्ष 1976 में सुधारों को पारित करने वाला पहला देश बन गया और इसके बाद कई स्कैंडिनेवियाई व यूरोपीय देशों ने वैवाहिक बलात्कार को एक आपराधिक अपराध बना दिया।
  • वैवाहिक बलात्कार के संबंध में कानूनी प्रावधान:
    • वैवाहिक बलात्कार के अपवाद: भारतीय दंड संहिता की धारा 375, जो एक पुरुष को उसकी  पत्नी के साथ जबरदस्ती अनैच्छिक यौन संबंधों की छूट देती है, बशर्ते पत्नी की उम्र 15 वर्ष से अधिक हो। इसे वैवाहिक बलात्कार के अपवाद" (Marital Rape Exception) के रूप में भी जाना जाता है।
    • अर्थात् IPC की धारा 375 के अपवाद 2 के तहत पंद्रह वर्ष से अधिक की आयु के पति और पत्नी के बीच अनैच्छिक यौन संबंधों को धारा 375 के तहत निर्धारित "बलात्कार" की परिभाषा से बाहर रखा गया है तथा इस प्रकार यह ऐसे कृत्यों के अभियोजन को रोक देता है।
  • 3. विधायकों का निलंबन
महाराष्ट्र विधानसभा के 12 विधायक अपने एक वर्ष के निलंबन के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय गए हैं।

सर्वोच्च न्यायालय ने पाया है कि विधायको का पूरे एक वर्ष के लिये निलंबन प्रथम दृष्टया असंवैधानिक है और इन निर्वाचन क्षेत्रों में एक संवैधानिक शून्य की स्थिति पैदा करेगा।

  • विधायकों के निलंबन के बारे में:
    • विधायकों को ओबीसी के डेटा के खुलासे के संबंध में विधानसभा में किये गए दुर्व्यवहार के लिये निलंबित किया गया है।
    • निलंबन की चुनौती मुख्य रूप से नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों के खंडन और निर्धारित प्रक्रिया के उल्लंघन के आधार पर निर्भर करती है।
      • 12 विधायकों ने कहा है कि उन्हें अपना मामला पेश करने का मौका नहीं दिया गया और निलंबन ने संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत कानून के समक्ष समानता के उनके मौलिक अधिकार का उल्लंघन किया है।
    • महाराष्ट्र विधानसभा का नियम 53: इसमें कहा गया है कि "अध्यक्ष किसी भी उस सदस्य को विधानसभा से तुरंत हटने के लिये निर्देश दे सकता है जो उसके फैसले को मानने से इनकार करता है या जिसका आचरण उसकी राय में अव्यवस्था उत्पन्न करता है"।
      • सदस्य को "दिन की शेष बैठक के दौरान खुद का अनुपस्थित" रहना होगा।
      • यदि किसी सदस्य को उसी सत्र में दूसरी बार वापस लेने का आदेश दिया जाता है तो अध्यक्ष सदस्य को अनुपस्थित रहने का निर्देश दे सकता है, जो "किसी भी अवधि के लिये सत्र के शेष दिनों से अधिक नहीं होना चाहिये"
  •  महाराष्ट्र विधानसभा द्वारा तर्क:
    • अनुच्छेद 212: सदन ने अनुच्छेद 212 के तहत अपनी विधायी क्षमता के तहत कार्य किया तथा न्यायालय को विधायिका की कार्यवाही की जाँच करने का अधिकार नहीं है।
      • अनुच्छेद 212 (1) के अनुसार, "किसी राज्य के विधानमंडल प्रक्रिया की किसी कथित अनियमितता के आधार पर किसी राज्य के विधानमंडल में किसी भी कार्यवाही की वैधता पर सवाल नहीं उठाया जाएगा।
    • अनुच्छेद 194: राज्य ने सदन की शक्तियों और विशेषाधिकारों पर अनुच्छेद 194 का भी उल्लेख किया और तर्क दिया है कि इन विशेषाधिकारों का उल्लंघन करने वाले किसी भी सदस्य को सदन की अंतर्निहित शक्तियों के माध्यम से निलंबित किया जा सकता है।
      • राज्य द्वारा इस बात से भी इनकार किया गया है कि किसी सदस्य को निलंबित करने की शक्ति का प्रयोग केवल विधानसभा के नियम 53 के माध्यम से किया जा सकता है। 
  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गए तर्क:
    • संविधान की मूल संरचना का उल्लंघन: विधानसभा में पूरे एक साल तक निलंबित विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व न होने से संविधान का मूल ढाँचा प्रभावित होगा।
    • संवैधानिक आवश्यकता: पीठ ने संविधान के अनुच्छेद 190 (4) का उल्लेख किया, जिसमें कहा गया है, "यदि किसी राज्य के विधानमंडल के सदन का कोई सदस्य साठ दिनों की अवधि तक सदन की अनुमति के बिना उसकी सभी बैठकों से अनुपस्थित रहता है, तो सदन उसकी सीट को रिक्त घोषित कर सकता है।"
    • वैधानिक आवश्यकता: जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 151 (ए) के तहत, "किसी भी रिक्ति को भरने के लिये वहाँ एक उप-चुनाव, रिक्ति होने की तारीख से छह महीने की अवधि के भीतर आयोजित किया जाएगा"।
      • इसका मतलब है कि इस धारा के तहत निर्दिष्ट अपवादों को छोड़कर, कोई भी निर्वाचन क्षेत्र छह महीने से अधिक समय तक प्रतिनिधि के बिना नहीं रह सकता है।
    • पूरे निर्वाचन क्षेत्र को दंडित करना: सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि एक वर्ष का निलंबन प्रथम दृष्टया असंवैधानिक था क्योंकि यह छह महीने की सीमा से आगे निकल गया था और यहाँ "सदस्य को नहीं बल्कि पूरे निर्वाचन क्षेत्र को दंडित किया गया।
    • सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का प्रश्न: उच्चतम न्यायालय से इस प्रश्न पर शासन करने की अपेक्षा की जाती है कि क्या न्यायपालिका सदन की कार्यवाही में हस्तक्षेप कर सकती है।
      • हालाँकि संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि न्यायालय ने पिछले फैसलों में स्पष्ट किया है कि सदन द्वारा किये गए असंवैधानिक कृत्य के मामले में न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है।
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